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मंगलवार, 15 जून 2010

ग्‍वाल के ब्रजभाषी छन्‍द - 1 (प्रस्‍तुति नवीन चतुर्वेदी)

ब्रज भाषा में ग्‍वाल के छन्‍द भाग - 1
(प्रस्‍तुति नवीन चतुर्वेदी )
और बिस जेते, तेते प्रानन हरैया होत,
बंसी की धुन की कबू जात ना लहर है|
एक दम सुनत ही, रोम रोम गस जात,
ब्योम बार डारे, करे बेकली गहर है|
'ग्वाल' कबि तो सों, कर ज़ोर कर पूछ्त हों,
साँची कह दीजो, जो पे मो ही पे महर है|
होठ में, कि फूंक में, कि आंगुरी की दाब में, कि-
बाँस में, कि बीन में, कि धुन में जहर है||

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