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बुधवार, 16 जून 2010

राम दयाल जी का छंद:- ( प्रस्‍तुति - नवीन चतुर्वेदी)

श्री राम दयाल जी का छंद:- ( प्रस्‍तुति - नवीन चतुर्वेदी)

आंख नाहि लागै जा को जबर सों बैर परै,
आंख नाहि लागै - चित्त हरि सों लगात है|
आंख नाहि लागै जो कुलीन - धन हीन - रिनी,
आंख नाहि लागै जा के लगौ रोग गात है|
आंख नाहि लागै जा कें कन्या बिबाह जोग,
आंख नाहि लागै जो बियोग दुख पात है|
कहें 'रामदयाल' पल पलक न लागै यार,
आंख नाहि लागै जा की आंख लग जात है||

गिरिधर जी की कुन्डलिया: 1 (नवीन चतुर्वेदी की प्रस्‍तुति)

श्री गिरिधर जी की कुन्डलिया: 1 (नवीन चतुर्वेदी की प्रस्‍तुति)

सांई बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यार|
बेटा, बनिता, पौरिया, यज्ञ करामन हार||
यज्ञ करामन हार, राज मंत्री जो होई|
जोगी, तपसी, बैदु, आपकों तपै रसोई|
कह 'गिरिधर' कवि राय, जुगन सों ये चल आई|
इन तेरह कों 'तरह' दियें बन आवै सांई|

श्री घना-नंद जी का सवैया: 1 (नवीन चतुर्वेदी की प्रस्‍तुति)

श्री घना-नंद जी का सवैया: 1 (नवीन चतुर्वेदी की प्रस्‍तुति)
पर कारज देह कों धारें फिरौ, पर्जन्य जथारथ ह्वै दरसौ|
निधि नीर सुधा के समान करौ, सब ही बिधि सज्जनता सरसौ|
'घन आनँद' जीवन दायक हौ, कछु मेरी हू पीर हियें परसौ|
कबहु वा बिसासी सुजान के आँगन - मो अंखियानहि ले बरसौ||

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