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शनिवार, 19 जून 2010

कान्‍हा काहे बॉसुरी बजावत है..... नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

कान्‍हा काहे बॉसुरी बजावत है.....
नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

मयूरन के नाचन सों, कोयल के गावन सों बगिया में नित ही खिले जो बसन् है
शीतल बयार बहे, मन् मन् पात चले, बगियन में देखिये कैसी सुगन् है
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चक्की जो चालिहै, इंजन की आवाज है तुक तुक की धुनि से मन महि आनन् है
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बगरी है शान्ति, छायी चेहरन पे कान्ति, चारों ओर देखिये गॉंव महिं कैसा आनन् है

भोर होत पनघट पे ले कलसे और मटको को, खींच रही पानी को गोरी में उमंग है

हॅस रही पागलिया, सखियन संग मस्ती की , इठला इतराय के बड़ी मौजन में कर रही बात है

चोली है धर फेंकी, मूंड़ धर ईंडुरिया, तापे फिर देखो धरे कलसन कों जात है

आपस में छेड़ रहीं, भेद खूब खोल रहीं, गोरियन के अंग अंग आज टपके शरारत है

कान्हा की बॉंसुरिया, बाज रही गैलन में, गोरी सब भूल मन मस् हुई जात है
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फेंक दईं गागरिया, भूलीं सब पनघटिया, बिसरे हैं होश, बस दौड़ी चली जावत है

बॉंसुरी के राग में, मन अटका है श्याम में, देखो पागल कैसी दौड़ी चली आवत है

सब भाग रहीं गौकुल में, गोरी और गैया सब बाबा ओर मैया सब श्याम रंग रंग जात है

सब डॉंटे हैं कान्हा को, प्रेम के दीवाने को, कान्हा काहे ऐसी बॉंसुरी बजावत है
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सुध बुध सब खोय रहे, प्रेम रंग कान्हा के, डॉंटतहु में नैनन से गिरे प्रेम की फुहार है

राधा इक गोरी ने , कान्हा चित चोरी ने, बतराई नैनन में, कछु मुस्काय के
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काहे बुलावे यहॉं, छेड़न को रोज रोज , राधा यूं कान्हा से कहत नैनन नचाय के

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